Wednesday, August 8, 2012

आरटीआई क़ानून को कमज़ोर कर रही है यूपी सरकार: उर्वशी

 

लखनऊ: UPCPRI (उत्तर प्रदेश सूचना का अधिकार बचाओ  अभियान), येश्वर्याज  सेवा संस्थान की आरटीआई शाखा के तत्वावधान में राज्य की राजधानी में मंगलवार को आरटीआई कार्यकर्ताओं की एक गोष्ठी  आयोजित की गयी l

गोष्ठी में विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता उषा शर्मा, प्रभुता  मिश्रा, बबिता सिंह, विष्णु दत्त मिश्रा और आरटीआई कार्यकर्ताओं, जिसमें वकीलों, प्रोफेसरों,इंजीनियरों, सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों और अन्य लोगों, में भाग लिया lUPCPRI की संयोजक उर्वशी शर्मा नें  बैठक की अध्यक्षता कीl

गोष्ठी  का उद्घाटन करते हुए  उर्वशी शर्मा ने कहा कि यह लगता है कि उत्तर प्रदेश राज्य में जागरूक नागरिकों नें सूचना के अधिकार का प्रयोग करके जीवन के हर क्षेत्र के  भ्रष्टाचार को उजागर कर सरकार  को परेशान कर दिया है  है, जिससे सात साल  पुराने आरटीआई  को कमजोर. करने का कार्य उत्तर प्रदेश (यूपी) में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने शुरू किया है l

प्रभुता  मिश्रा ने कहा कि  हम सभी जानते हैं कि 31,2012 जुलाई को उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल ने लोकायुक्त को  सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट)  की धारा 24 (4) के तहत  छूट देकर इसे दूसरी अनुसूची में डालने  का फैसला किया है lकैबिनेट का यह निर्णय सरकार के लोकायुक्त को मजबूत बनाने का वादा करने के  विपरीत है lसमाजवादी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में लोकायुक्त के कार्यालय को मजबूत करने के लिए कदम उठाने के लिए वादा किया था, लेकिन इसे और अधिक पारदर्शी बनाने के बजाय, सरकार ने पहले लोकायुक्त के कार्यकाल में आठ साल के लिए  वृद्धि की , फिर लोकायुक्त कार्यालय में किसी  व्यक्ति द्वारा लोक सेवक के खिलाफ की गयी शिकायत के प्रमाणित न होने पर शिकायतकर्ता को ही  दंडित करने के लिए प्राविधान किया ,और  अब लोकायुक्त को आरटीआई अधिनियम के दायरे के बाहर  रखने के प्रस्ताव का अनुमोदन कर लोकायुक्त संगठन को कमजोर करने और उसके  राजनीतिकरण करने के संदेह को वल प्रदान किया है l उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने लोकायुक्त कार्यालय एक बहु - सदस्यीय संस्था  बनाने,पुलिस की आर्थिक अपराध विंग लोकायुक्त अधिनियम के तहत लाने और मुख्यमंत्री कार्यालय को  लोकायुक्त परिधि के अंतर्गत लाने के लिए कुछ भी नहीं किया  है l

कार्यकर्ता उषा शर्मा ने कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 24 (4) केवल सुरक्षा और खुफिया संगठनों को  छूट देता है.l इस छूट के लिए अर्हता प्राप्त करने के लिए संगठन के लिए  या तो सुरक्षा से संबंधित सेवाएं प्रदान करने के कार्य  या खुफिया अन्वेषण  के लिए जिम्मेदार होना चाहिए और यह इस संगठन का प्राथमिक कार्य होना चाहिए l लोकायुक्त न तो सुरक्षा और न ही एक खुफिया संगठन है l यह मुख्य रूप से स्वं में  निहित शक्तियों के साथ सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ लगाए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच का संचालन करने के लिए एक संस्था है lलोकायुक्त धारा 24 (4) के तहत छूट के लिए योग्य नहीं है l उत्तर प्रदेश की सरकार को  लोकायुक्त को सूचना का अधिकार अधिनियम  से बाहर रखने के निर्णय की आवश्यकता न होने पर प्रकाश डालते हुए विष्णु दत्त मिश्र ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 (1) (g) और 8 (1) (hhh) उत्तर प्रदेश लोकायुक्त अधिनियम 1975 की धारा 10 और धारा 15 के प्रावधानों का संरक्षण करता है l "उत्तर प्रदेश सरकार का यह  निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ की "भ्रष्टाचार के खिलाफ  कन्वेंशन" का स्पष्ट उल्लंघन है l भारत ने पिछले वर्ष ही इस कन्वेंशन का अनुमोदन किया है l सूचना का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के  अधिकार का अंग है l भारत के संविधान के  अनुच्छेद 19 के (1)  (g) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार . 'सूचना का अधिकार अधिनियम' के लिए सांविधिक रक्षा देता है lअनुच्छेद 19 के (1)  (g) के तहत  भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकारों की  संविधान के अनुच्छेद 19 (2 के तहत दिए गए प्रतिबंध के सिवाय  कटौती नहीं की जा सकती है l लोकायुक्त द्वारा निष्पादित किया जाने बाला कार्य संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत प्रगणित श्रेणियों में से किसी में भी नहीं आता है अतः राज्य सरकार लोकायुक्त को विधिवत अधिनियमित कानून के सिवाय मात्र  परिकल्पित कार्यकारी कार्रवाई से सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर नहीं कर सकती है" उर्वशी शर्मा ने कहा l

गोष्ठी में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उत्तर प्रदेश के निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी विधायकों को  उत्तर प्रदेश लोकायुक्त को सूचना का अधिकार अधिनियम से छूट देने के राज्य सरकार के निर्णय की वापसी की मांग से सम्बंधित ज्ञापन भेजने का संकल्प सर्वसम्मति से पारित किया गया l

 

http://www.instantkhabar.com/lucknow/item/787-rti.html

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